An Article on De-Addiction Center :- नशा मुक्ति केंद्र की स्थापना नशा करने वालों के लिए एक जेल। कैसे होता है नशा करने वालों का शोषण ?

 


नशा मुक्ति एक ऐसा कार्य जिस से ग्रस्त व्यक्ति का जीवन ही नहीं उसके परिवार वालों को भी बहुत बड़ी राहत है। परन्तु इससे लोग अपना स्वार्थ सिद्ध कर रहे हैं। और अपराध कर रहे हैं। बिलकुल प्रशासन की नाक के नीचे आइये बात करते हैं। क्या अपराध है। नशा करने वाले के जीवन पर इसका क्या असर है नशा मुक्ति केंद्र क्यूँ नहीं डाल प् रहे हैं। नशा करने वाले के जीवन पर असर ?



कहाँ है कमी, कैसे है ये भ्रष्टाचार, कहाँ है। प्रशासन की कमी ?

नशा मुक्ति केंद्र में एडिक्ट और उसके परिवार की सहमति से ही इलाज करवाया जा सकता है। और ये संस्थाएं पूणतः समाज सेवा है। सिर्फ दान के द्वारा संस्था इस का संचालन कर सकती है। इसमें सरकार के द्वारा गाइडलाइन के अनुसार एडिक्ट को बंधन में नहीं रखा जा सकता मिला हुआ पैसा संस्था के बैंक अकाउंट में ही लिया जाना चाहिए अगर नगद पैसा प्राप्ति होने पर रसीद काट कर देनी होती है। और 24 घंटे में पैसा बैंक में जमा करवाना होता है। एडिक्टों को देख रेख में एक डाक्टर, एक मनोचिकित्सक, एक काउंसलर जो डिग्री प्राप्त हो, दो नर्स, दो बाडबाय, योगा टीचर, चौकीदार, सफाईकर्मी, रसोइयाँ, कलर्क और प्रोजेक्ट डायरेक्टर बहुत जरुरी है। इन सबकी अलग अलग भूमिका है। परन्तु होता क्या है। जिससे एडिक्ट संस्था और घरवालों के प्रति नाराज होता है। इस सारी प्रक्रिया का क्या असर होता है। :-



एडिक्ट आधे अधूरे संस्थान में नेगेटिव लेकर और भी घातक हो जाता। है जो अपने जीवन व अपने परिवार और संस्था के स्टाफ के लिए भी घातक हो जाता है। वो कभी नहीं सुधरेगा या डर में एक दो महीने ठीक भी हो जाएगा तो परिवार वाले इसी को सुधार मानकर बार बार ऐसी संस्थाओं में ट्राई करेंगे। और किसी को जबरन घर से उठाकर लाना और ताले में बंद रखना एक अपराध के साथ साथ उस व्यक्ति मानवाधिकारों का हनन हैं। वो नशे के चंगुल में गया क्यूंकि उसे इसके रिजल्ट की जानकारी नहीं थी। और संस्था में भी उसे कोई काउंसलिंग नहीं मिली। ये सब अपराध तो है ही उस व्यक्ति के जीवन के साथ खिलवाड़ भी है।



गलती को स्वीकार करना ही सुधार की पहली प्रक्रिया है। परन्तु किसी को जबरन पकड़ना और बंद करना उसे प्रेशर में लाकर उससे कुछ भी करवाया जा सकता है। या वो इस कदम को नेगेटिव ही लेगा जिससे उसके हालात और ज्यादा बिगड़ेंगे इसके अतिरिक्त ये गलत प्रक्रिया उसके परिवार के साथ लूट है। और ये लूट उनकी नासमझी के कारण है। जब नशे वाला व्यक्ति बार बार तंग करता है तो उसके परिवार वाले ठीक होने की उम्मीद में सख्त फैसले करते हैं। और संस्थाएं बड़ी बड़ी बाते करके उन्हें लूटती हैं। ये ही बाते नुक्सानदायक होती हैं। उनका शोषण होता है जिसका नुक्सान एडिक्ट उठाता है। और आर्थिक रूप से उसका परिवार उठाता है। कई बार परिवार वाले जायदाद के लिए जानबूझ कर सेंटर में बंद करवाते हैं। जिसका कारण उनका भी लालच है और जब योग्य स्टाफ नहीं होता तो ऐसे चांस बढ़ जाते हैं।



हालांकि हर तरफ के हालात पर अलग अलग क़ानून है। परन्तु जब प्रशासन और शासन गैर-जिम्मेदार व भ्रष्ट हो तो बिना ज्ञान के इन लोगों का रक्षक कौन है। और हालात तब और भी गंभीर होते हैं। जब प्रशासन के रवैये के कारण ये सस्थाएं जो लूट के लिए गठित हुई हैं। जिनके लेखे जोखे पर कोई नहीं पूछता और अगर शिकायत भी हो जाए तो वो शिकायत भी भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ती है। अधिकारियों के ज्यादातर CMO को जबकि ये सस्थाएं और इनकी गाइडलाइन जो की सरकारी पैसे मुख्य रखकर लिखी गई है। वो केंद्र के अंडर में है। जिसके अधिकारी अक्सर कार्यवाली सस्थाओं पर रेड करते रहते हैं। परन्तु ये कार्यवाही हरियाणा, पंजाब और दिल्ली में होती है। यहां के निवासी जागरूक हैं। यूपी में इस सब पर कार्यवाही न मात्र है। और यूपी के सरकारी विभाग नशा उन्मूलन पर रिपोर्ट शासन के उच्च अधिकारियों को भेजते रहते हैं। और वहां से रिपोर्ट केंद्र के विभाग के पास जाती है। ऐसी सस्थाओं के होने से उनका खुद वजूद बना रहता है। और कई संस्थाएं तो इन विभागों को रिपोर्ट नहीं करती हैं। उनका अपना कायदा है। जिसमें पैसा प्रमुख है बाकी इन विभागों के अधिकारी अपने उच्च अधिकारियों की सरपरस्ती में केंद्र के द्वारा जारी राशि का गबन करने में लगे रहते हैं। परन्तु इनके पास टाइम ही नहीं होता दूसरी संस्थाओं को निरिक्षण करने का इन संस्थाओं का मेन अधिकारी जिला अधिकारी होता है। जिनका शेड्यूल काफी बीजी है। इस सबके चक्कर में शोषण एडिक्ट का और उसके परिवार का होता है। ये एक अलग तरह का भ्रष्टाचार है।



जय हिन्द।

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