आखिर पैसा कैसे एडिक्ट के लिए नशा मुक्ति केंद्र में घातक हो जाता है ?



हम लोग एडिक्टों की प्रताड़ना की नहीं उनसे हुई मार-पीट की नहीं उस स्थिति की बात कर रहे हैं ! जो न सिर्फ व्यक्ति के जीवन को बर्बाद करता है और उनके परिवार के पैसे को बर्बाद करता है ये एक ठगी है ! एक धोखा है ! और जो स्टाफ इस कार्य को अंजाम देने में गलत का साथ देता है ! और जो सेंटर लुभावने पोस्ट डालकर व्यक्ति की भावनाओं से खेलता है ! वो बेईमानी और ठगी कर रहा है जो व्यक्ति सेंटर में बंद है और कई महीनों से बंद है वो समझौता करते हैं सारी जिंदगी के लिए नहीं जितना समय वह सेंटर में हैं ! उतने समय के लिए और नकाब लगाने के कारण सही जानकारी न मिलने के कारण वो व्यक्ति गुस्से को भीतर रखकर लगातार अपना टाइम पास करता है और समझौते करता है उसे लगने लगता है वो कभी ठीक नहीं हो पायेगा और वो परिवार वालों के इस फैसले पर अंदर ही अंदर बहुत गुस्से में होता है एडिक्ट जब तक इस बोझ को नहीं उतारेगा उसके ठीक होने के चांस बिलकुल नहीं हैं ! परन्तु एडिक्ट के घर वालों की इच्छा उसके सुधार की है जो वर्त्तमान में सेंटर के माहौल में नामुमकिन है !





सेंटर वालों को पैसे का लालच है और उसी की प्राप्ति के लिए वो पहले एडिक्ट पर डर का माहौल बनाते है स्टाफ को पता होता है कि गलत हो रहा है परन्तु अपने लालच में वो सेंटर मालिक के हक़ गलत काम करते हैं ! पेशन्टों के साथ अमानवीय व्यवहार होता है मालिक का पैसा बचाने के लिए खाना बनवाना और टॉयलेट साफ़ करवाना जैसे कार्य एडिक्टों से करवाए जाते हैं डर में एडिक्ट मैन्युप्लेट की भावना में आता है और कुछ समय के लिए ही सेंटर के हक़ में हर वो कार्य करता है जो मानवाधिकार के रूप में गलत है ! क्यूंकि सेंटर वालों के पास न ही काउंसलिंग है और न ही अच्छा माहौल बस अपना पैसा बचाने के लिए वो इन एडिक्टों से मजदूरों की तरह काम लेते हैं ! और उनके परिवारों को झूठे दिलासे देकर पैसा लेते है पैसा वो आँखे बंद करके देतें हैं क्यूंकि उन्हें अपने बच्चे के ठीक होने की उम्मीद है और अगर एडिक्ट सामने से न झुके तो सेंटर वालों से टकराव दोनों ग्रुपों के लिए घातक हो जाता है ये सभी खेल पर जान कारी होनी बहुत जरुरी है !





प्रशासन अगर ध्यान दे तो इस व्यवस्था में सुधार कर एडिक्टों का जीवन संवारा जा सकता है परन्तु गैर-जिम्मेदारी के कारण ये समाज सेवा का कार्य लोगों के लिए ठगी का केंद्र बना हुआ है सरकार की गाइडलाइन के अनुसार आमदन व खर्च की पारदर्शिता है परन्तु ध्यान देने वाला कोई नहीं इसी का लाभ उठाती है संस्थाएं ! किसी नेता या अधिकारी से सिफारिश करवा कर अपनी कमियों को छुपाया जाता है इस सब के बीच एक बड़ी घटना को दावत दी जाती है ! बस बची है ! तो एडिक्ट की किस्मत से क्यूंकि भगवान् ने उसकी सांस ज्यादा लिखी है और अपराध भी गंभीर है ! परन्तु प्रशासन गंभीर नहीं है ! इसमें ऐसा नहीं है कि कानून नहीं है ऐसी संस्थाओं को चलाने के लिए कुछ विभागों से रजिस्टर्ड होना बहुत जरुरी है परन्तु अधूरी जानकारी और प्रशासन की बेपरवाही निमंत्रण है ! बड़ी घटना का ! बिना शिकायत के कभी जागृत हुए ही नहीं अधिकारी और एडिक्ट व उनके परिवार जानते ही नहीं तो क्या इन बेलगाम सेंटरों और बर्बाद होते एडिक्टों को उनके हाल पर छोड़ दें ! मजबूरी में दिया पैसा जो सेंटर वालों की बेईमानी से सेंटर वाले लेते हैं ! इस ठगी को ऐसे ही छोड़ दिया जाए ! एडिक्ट ने गलती की वो जाने अनजाने में नशे के चंगुल में फंस गया और ठीक होने के लिए जानकारी चाहिए जबकि उसका शोषण होता है हमारा कर्त्तव्य क्या है ? कृपया कमेंट करें





जय हिन्द !  

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