Punjab News : - संयुक्त किसान मोर्चे के दो फाड़ होने के बाद पंजाब में दो किसान नेताओं में चल रही जुबानी जंग ? एक रिपोर्ट।



किसानी आंदोलन के बाद जो हो रहा है। वो उन लोगों से छिपा नहीं है। जो कभी इस आंदोलन के साथ थे या इसको सपोर्ट करते थे। मुद्दों को समझते थे। तभी अचानक मोदी जी इसके कारण कुछ भी रहे हों। क्यूंकि मोदी जी ने भी बड़ा भावनात्मक भाषण दिया और वो जैसा सोचता था वह अपनी सोच को प्रमुख रखकर संतुष्ट हुआ कि हमने मोदी जी को हरा दिया और जो मोदी जी की विचारधारा में सहमति रखता था। वो इस बात पर संतुष्ट हो गया कि कितना बढ़िया प्रधानमन्त्री है। मूर्खों को नहीं समझा पाया तो खुद तीन कृषि क़ानून वापस ले लिए। और जो लोकतंत्र में विश्वास रखते थे उनका सोचना था कि जनता से बड़ा कोई नहीं जब जनता सरकार के साथ नहीं है। तो बड़ी से बड़ी सरकार को झुकना पड़ता है। आदि आदि सोच भी लोगों की। लेकिन जिन व्यक्तियों ने सबसे ज्यादा दबाव झेला वो थे किसान नेता किसी क्लाइमेक्स में जब आंदोलन को खतरा बनता तो उस रोमांचक पल में हर तरह की भावना को झेलते किसान नेता मानसिक रूप से कैसे रहे होंगे ये इस बात से सिद्ध होता है। कि जब मोदी जी ने क़ानून वापिस की घोसणा की ये दुविधा में गए समझ ही नहीं पाए अब क्या फैसला लिया जाए और किसानों का सबसे बड़ा मुद्दा छोड़ कुछ लोग तो मिले समर्थक से बड़े नेता बनने की मंशा लिए आंदोलन स्थगित कर वापिस घरों की तरफ चल दिए और MSP के मुद्दे पर बात ही नहीं की जिस पर सरकार घिर सकती थी।



मोदी जी ने अपने अनुभवी सलाहकारों के साथ लोकतंत्र की कमी का लाभ उठाकर इस किसान नेताओं का किरदार लोगों के सामने ला दिया। शायद मेरे इन शब्दों से कुछ लोग सहमत हो की लोकतंत्र की कमी परन्तु मेरा मानना है। कि मोदी जी ने भारत के इतिहास और नेताओं पर विशेष पढ़ाई कर रखी है। और मोदी जी जो मिडिया से रूबरू नहीं होते। इसी कारण से उनकी भावनाएं नहीं पढ़ी जा सकती थी। और एक वर्ष से ऊपर के समय पीरियड में हर किसान नेता को सरकार और उनके सलाहकारों ने पढ़ लिया था। हम भारितयों को जब अंग्रेज आजाद करके गए थे तो उन्होंने हमारे भविष्य को तभी ये तय कर दिया था जब वो हमें लोकतंत्र का अधिकार देकर गए थे शायद वो जानते थे कि अगर इस देश में व्यक्ति विशेष को सिमित रखना है। तो इन सबको वो पावर देनी चाहिए जिसका ये लोग महत्तव नहीं जानते। क्यूंकि हम भारीतये इतिहास से सीखते नहीं हैं। और हमारा नेतृत्व देश के प्रति ईमानदार नहीं हैं। ये ही बात मोदी जी ने भी महसूस की होगी। अब आगे क्या ?



आज आंदोलन के इतने दिन बाद दो किसान आगू पंजाब में एक दूसरे पर आरोप लगा रहें हैं। गुरुनाम सिंह चढुनी मीडिया में लखीमपुर के आंदोलन को बेचने की बात कर रहें हैं। सरकार ने 26 जनवरी वाले दिन घटित होने वाली घटना में नाम जद होने के बाद भी प्रमुख नेताओं को इसी दिन के लिए ही गिरफ्तार नहीं किया ताकि सरकार की किरकिरी नहो और नेताओं का चेहरा सामने गया शायद निति ये ही कहती थी हलांकि भारत के क़ानून सविंधान के सम्मान में कहा जाता है। कि जेलों में बंद 70% लोग निर्दोष हैं। क्यूंकि गुनाहगारों को अनदेखा करना पड़ेगा ताकि सरकार की छवि प्रभावित हो वैसे भी इस देश में आज के दौर में दृश्यम जैसी फिल्म सुपरहिट है। क्यूंकि हम लोग भावनात्मक लोग हैं। आगे उस समय सरकार तो छवि बचा गई परन्तु लम्बी लड़ाई के बाद किसान नेताओं ने एक दूसरे पर आरोप लगा कर अपना चेहरा लोगों के सामने ला दिया और उसमें एक सवाल सभी किसान नेताओं के सामने गया की अगर आप लोगों के द्वारा गठित संयुक्त किसान मोर्चे में कुछ नेता सही नहीं थे तो आप लोग संगठित क्यूँ थे। क्या किसान नेताओं ने मोदी जी को इतना मजबूर मान लिया था कि उन लोगो ने उलेवाल जैसे नेता को भी अनदेखा कर दिया जो मोदी सरकार का एजेंट था जैसे रुलदू मानसा कह रहें हैं। अब ?



वैसे उलेवाल के अब पंजाब सरकार के खिलाफ आंदोलन के बाद तो रुलदू मानसा के विचार तो नहीं बने होंगे और उलेवाल भी पहले से नहीं जानते थे कि रुलदू रुकने के मौके पर आंदोलन छोड़कर भागेंगे अगर नाही जानते थे तो उनका कैसा नेतृत्व था की एक व्यक्ति की भावनाओं को नहीं समझ सके गुरुनाम सिंह चढुनी राकेश टिकैत को पहली बार तो नहीं मिले थे कि टिकैत कैसा व्यक्ति है। लखीमपुर आंदोलन में टिकैत को संयुक्त किसान मोर्चे के बिना फैसला करने का अधिकार किसने दिया और अगर टिकैत ने SKM के बिना फैसला किया तो मोर्चे ने टिकैत के फैसले पर किन्तु-परन्तु करते हुए आंदोलन क्यों नहीं किया। ऐसी बहुत सी बातों से किसान आंदोलन समर्थक शर्मसार हुए बैठे हैं।



इन नेताओं ने किसानों के बड़े मुद्दे MSP को अनदेखा किया। और जो इन पर आरोप लगाता था कि ये आढ़ती लोग हैं। ये बिजनेस मैन हैं। और इन लोगों ने ये सब साबित भी किया। अब लोग इन सबसे सहमत भी हैं। खफा भी हैं और शर्मिंदा भी हैं। कि इनके पीछे लग कर लोग राजनीति रूप से इस्तेमाल भी हुए। परन्तु इसका ये मतलब नहीं है। कि किसानों के मुद्दे नहीं हैं। बस लोग नेताओं के द्वारा ठगे जाने के बाद बोलने कि स्तिथि में नहीं हैं। बाकी आप लोगों के कमेंट देने की प्रार्थना करते हैं। बात को सही ढंग से पेश करने की चाह में लेख लम्बा हो गया और विनती है अगर आप लोग सहमत हों तो भी कमेंट कर मार्ग दर्शन करें।

जय हिन्द।  

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