Entertainment News : - फिल्मों व नाटकों में चित्रण होने से सीन क्या वास्तविक में हमारे जीवन से टच है ?



किसी भी फिल्म की शुरुआत में लिखा जाता है। कि यह फिल्म की कहानी काल्पनिक हैं। और इसका किसी भी जीवित व्यक्ति से कोई सम्बन्ध नहीं है। अगर कुछ होता है तो तो संयोग मात्र है। और कई बार सत्य घटनाओं से प्रेरित होकर लिखा जाता है। इसके पीछे का कारण ये होता है। कि अगर किसी व्यक्ति के जीवनी की कथा पर कुछ फिल्म बनाएंगे तो उसे भी लाभ या पैसे देना होगा। और कोई व्यक्ति दावा न कर दे। वैगरह-2



परन्तु आप देखेंगे कि बहुत से व्यक्ति फिल्म इसलिए देखने जाते हैं। कि वह फिल्म उनके जीवन से टच कर रही होती है। या यूँ कहें कि जो भावनाएं उनके अंदर दबी हैं। चाहे वो नायक कि हो या खलनायक की फिल्म का पार्ट उससे टच हो रहा है। अब आप कहेंगे हर फिल्म की कहानी अलग अलग है। परन्तु मोरल एक ही है। सत्य की जीत, अब हर व्यक्ति के सत्य को समझने और देखने का तरीका अलग अलग और फिल्मों की कहानियां भी उसी दौर के अनुसार हिटसुपरहिट व फ्लॉप होतीं रहीं हैं। जैसे पुराने समय में "मदर इण्डिया" जिसमें बिरजू को लालची लोगों ने और उसके आक्रोश ने बागी बना दिया लोगों की भावनाएं उसके साथ थी। परन्तु जब वह लाला की बेटी को उठाने की कोशिस करता है। तो मदर इण्डिया अपने बेटे को गोली मार देती है। ये सैद्धांतिक समय था जिसमें उस समय के लोगों की सोच के अनुसार इस फिल्म को बहुत सराहना मिली। एक समय ऐसा था यहाँ फिल्म के खलनायक के सामने हीरो की भूमिका दब गई परन्तु इस तक पहुँचने से पहले कई फिल्मों में डाकू को साधू बनता दिखाया गया परन्तु धीरे धीरे विलेन हावी हो गया हीरो पर परन्तु क़ानून को जीतता दिखाया गया लोगों ने इन फिल्मों को काफी प्यार दिया और हिट किया। क्यूंकि उनकी भावनाये अपने अंदर रावण के कारण इन फिल्मों से जुड़ गई। अब भी समाज के सिद्धांत अनुसार हीरो से विलेन बना व्यक्ति सहराया जा रहा रहा है। जैसे दृश्यम के दोनों पार्टों जिनमें एक गलत लड़के की ट्रेजडी मृत्यु पर अपने परिवार और बेटी व पत्नी को गलत तरीके से क़ानून की कमियों का लाभ उठाकर बचाता हुआ हीरो फिल्म हिट लोगों की भावनाएं जुडी समाज की सोच को दर्शाती और दिखाती हमारी फ़िल्में हर समय के समाज की सोच को दिखाती है। अब यहाँ ये कहना गलत नहीं होगा कि फिल्मों के जरिये हम लोगों को धर्म से जोड़ने के लिए कुछ ऐतिहासिक व पुरानी कथाओं पर फ़िल्में जिनमें दिखाया गया हर व्यक्ति के अंदर देश प्रेम के साथ साथ अपने धर्म व पूर्वजो के द्वारा किये गए कार्यों से प्रभावित होकर अपनी संस्कृति व विरासत से जुड़ते हैं। या ये फ़िल्में जोड़ती हैं। ऐसा कुछ पार्ट हमारे जीवन में फिल्मों का है।



अब जैसे हम लोग राजनैतिक फिल्मों को ज्यादा महत्त्व नहीं देते वैसे ही हमारे जीवन में हम राजनीति के खिलाफ हैं। इसलिए हम इन फिल्मों के प्रति भी औसत रहे हैं। राजनेताओं के प्रति भी हमारे विचार अच्छे नहीं हैं। हाँ अगर किसी गैंगस्टर पर फिल्म बनी या उनकी फिल्म में राजनीति के पार्ट पर हमने नजर रखी कारण ऐसी फिल्मों में भी राजनेता या पार्टियां खलनायक के रूप में आई और ऐसी फिल्मों ने भी हिट।

अब अतः मैं आप लोगों से सवाल क्या फ़िल्में हमारे समाज का आइना हैं। कृपया कमेंट करें।

जय हिन्द।  

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