Lakhimpur Kheri :- शहीद किसानों की याद में 3 अक्टूबर को लखीमपुर खीरी में पहली बरसी समागम पर एक विशेष रिपोर्ट

3 अक्टूबर 2021 की घटना किसानों के द्वारा रोष प्रर्दशन हो रहा था। केंद्रीय गृह राज्यमंत्री के गाँव में प्रोग्राम था मुख्य मेहमान के रूप में राज्य के उपमुख्यमंत्री ने  गाँव में आना था। इन नेताओं को काले झंडे दिखाने के लिए हजारों किसान जमा थे। कुछ छोटे बड़े किसान नेता भी इस भीड़ में थे प्रशासन सतर्क था फिर सुरक्षा के नाम पर उपमुख्यमंत्री का प्रोग्राम कैंसिल हो गया। और उसके बाद भारतउत्तर प्रदेशलखीमपुर-खीरी में एक घटना हो गई जिसमें आठ जाने चली गई जिनमें चार किसान, एक कवरेज पत्रकार और तीन बीजेपी के कार्यकर्ता अपनी जान से चले गए। कौन गलत था कौन सही ये तो कोर्ट का फैसला और आने वाला वक्त बताएगा। परन्तु अब इस घटना को 3 अक्टूबर 2022 को एक साल पूरा हो जाएगा। मृतक (शहीदों) किसानोंपत्रकार (शहीद) की पहली बरसी को गुरुद्वारा साहिब कौडियाला घाट में शहीदों को याद करते हुए मनाया जाएगा। इस सारे समागम की व्यवस्था गुरुद्वारा साहिब के संत बाबा काला सिंह जी व समूह साध-संगत के द्वारा किया जाएगा। और संयुक्त किसानमोर्चे की तरफ से भी इस समागम में आने का आवाहन किया गया है।



अब मुद्दा जो इस बरसी को राजनीति का माहौल दे रहा है। वह यह है कि ये बरसी मृतक किसानों के परिवारों की तरफ से या मृतक पत्रकार के परिवार की तरफ से नहीं है। ये बरसी का प्रोग्राम गरुद्वारा साहिबकौडियाला घाट के संत बाबा काला सिंह व साध-संगत की तरफ से है। परन्तु संयुक्तकिसान मोर्चे की तरफ से आवाहन करके इसे राजनीतिक रंग देने की कोशिस की जा रही है। जो कि गुरुद्वारा साहिब की परम्पराओं के अनुसार गलत है या इस समागम को पहले की तरह संयुक्त किसान मोर्चा ही करता जैसा प्रोग्राम 3 अक्टूबर की घटना के बाद SKM ने उसी जगह जहाँ हुई थी वहीं अंतिम अरदास करके किया था। परन्तु अब यह बरसी गुरुद्वारा साहिब की संगत कर रही है। वहां संयुक्तकिसान मोर्चे की राजनीति पूर्णतः गलत है। अब इस किसानी आंदोलन को आगे खींचने के लिए पर्याप्त अनुदान अब संयुक्त किसान मोर्चे के पास नहीं है। शायद इस कारण से संगत की माया से किसान नेता अपनी राजनीति कर रहें है। वैसे भी इतनी बड़ी घटना पर जो राजनीति करके किसान संगठनों ने अपनी जेबें भरनी थी वो अंतिम अरदास  समय हजारों झूठे वादे करके किसानों के साथ ठगी कर चुके, ये किसान संगठन अब धर्म का सहारा लेकर आंदोलन को आगे बढ़ा रहे हैं।


75 घंटे का राजापुरमंडी लखीमपुर में असफल प्रदर्शन किया था इसी संयुक्त किसान मोर्चे ने तब भी संगत से प्रोग्राम के नाम पर माया इकठ्ठा की गई थी। परन्तु दिल्ली आंदोलन के समय जो भावना किसान संगठनों में थी वो 75 घंटे के प्रदर्शन में नजर नहीं आई खासतौर पर उत्तरप्रदेश के मुख्य किसान नेताओं में तो बिलकुल ही नहीं। जबकि पंजाबहरियाणा के किसानों ने उस 75 घंटे के धरने में पंहुच कर अपनी हाजिरी दर्ज करवा दी थी परन्तु यूपी का नेतृत्व 55 घंटे में ही हाँथ खड़े कर गया। शायद अब पहले वाले हौसलें नहीं हैं। यूपी के किसान नेताओं के अब पहली बरसी है। मृतक शहीद किसानोंपत्रकार भाई की।



इस सारे घटनाक्रम में नया रंग तब आया जब जेल में बंद किसान गिंदा के भाई ने सोशल मीडिया के माध्यम से ये आवाहन कर दिया गया कि 3 अक्टूबर को बरसी समागम में पहुंचे संगत से विचार विमर्श करना है। उन्होंने कहा जो गिंदा को प्यार करते हैं। या मानते हैं वो जरूर पहुंचे। अब ये क्या नई राजनीति है। ये तो तीन अक्टूबर को पता चलेगा। परन्तु इस अपील से थोड़ा बहुत माहौल गरम जरूर हुआ है। यहाँ पर एक बात ये है कि लखीमपुर 3 अक्टूबर की घटना के साथ यूपी के किसानों का लगाव हो या न हो परन्तु पंजाबहरियाणा के किसानों का है। अब 3 अक्टूबर को बरसी समागम में शहीदों के लिए अरदास की जायेगी व उन सब शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित की जायेगी। अगर यूपी किसान संगठन अगर असफल है तो अब गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी से अपील है। कि न्याय मिलने का काम व किसानों के हकों की लड़ाई अब गुरुद्वारा कमेटी करे ताकि जो किसान भाई जेल में हैं। उनकी रिहाई हो सके। और जो शहीद हुए हैं उनको इन्साफ मिल सके। यह मेरे अपने विचार हैं। संगत के चरणों में प्रार्थना है कि अपने विचार रखे ताकि ऐसा माहौल बन सके जो सभी के हितों की रक्षा का हो।,

यूपी के किसान नेताओं के लिए चार लाइनें :-

अंत में यूपी के किसान संगठनों से हम किसान क्या अपेक्षा रख सकते हैं। यहाँ के नेता अपने लिए असलहे के लाइसेंस बनवाने के लिए खुद पर हमले करवा रहे हैं और बड़ी बात ये की पुलिस कप्तान के संज्ञान में होने के बावजूद मामला दब गया और गन्ने का भुगतान ये संगठन करवा नहीं पा रहे क्यूंकि ये खुद प्रशासन और किसानों के बीच की कड़ी है। जिस में इनकी जिम्मेदारी शायद इतनी है कि किसानों का प्रदर्शन भी होता रहे। और अधिकारियों को अपने ऊपर के आकाओं से भी न सुननी पड़े और इनाम के एवज इन नेताओं को पुलिस सुरक्षा व गन्ना बीज वितरण लाइसेंस और छोटे मोठे काम होते रहेंगे बाकी रही जेल में बंद किसान व उनके परिवारों की तो उनको तो स.जसबीर सिंह विरक् क्या कह चुके हैं। ये शब्द तो शायद आपने हमारे यू-टयूबफेसबुक पेज sss.news.hindi की वीडिओ में सुन ही चुके होंगे नहीं तो सुन लीजियेगा। 75 घंटे के धरने के समय जब पंजाब के किसान नेता जिलाधिकारी महोदय के दफ्तर में ज्ञापन देना चाहते थे। परन्तु यूपी केकिसान नेता पीछे हटते नजर आये। तो एक पंजाब के नेता के चेहरे का गुस्सा दर्शा रहा था कि मीटिंग में क्या हुआ होगा। अब ज्यादा नहीं कहता हूँ यहीं बात को रोकते है। व 3 अक्टूबर की पहली बरसी समागम का इन्तजार करते हैं।                                                                       

                                           जय जवान जय किसान    

                                                जय हिन्द                                                                लेखक की कलम से


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