Corruption - भष्ट्राचार हमारे देश की तरक्की के अंदर सबसे बड़ा अवरोध क्यूँ ?

भ्रष्ट सिस्टम के कारण विकास के मायने बदल जाते हैं। क्यूँ किसी भी कार्य को पूर्ण करने में संबंधित विभाग के अधिकारियों का अहम रोल होता है। अगर वो अपने दायित्त्व को ईमानदारी से नहीं निभाएंगे तो जिस लाभ के उद्देश्य से समाज के लोगों के लिए वो स्कीम लाई गई है। वहां तक लाभ पहुँच नहीं पाएगा। आधा अधूरा कोई भी काम कभी भी कामयाबी के मुकाम तक नहीं पहुँच पाता। आखिर सब कुछ मिलने के बाद संबंधित अधिकारी भ्रष्ट क्यूँ हो जाते हैं। :-


1. उच्चतम जीव स्तर प्राप्त करने के लिए भ्रष्ट साधनों का इस्तेमाल।

2. पारदर्शिता का अभाव और क़ानून की जटिलता की आड़ में भ्रष्टाचारी उपायों को अपनाने में आसानी।

3. भ्रष्टाचार के लिए दिए जाने वाला दण्ड तथा दण्ड विधानों का अपर्याप्त होना।

4. भ्रष्टाचार के मुकदमों का दीवानी प्रकृति का होना और लम्बे समय तक चलना अथवा लंबित रहना।


ये कुछ तर्क व तथ्य हैं जिनके कारण इसको नियंत्रित करना संभव ही नहीं है। सिस्टम में सुधार करने का प्रयास ही नहीं किया जाता क्यूँ ये चैन ऊपर से नीचे तक जुडी है।

                                                     हम आपको एक घटना का जिक्र करके समझाने का प्रयास करते हैं। एक बार एक न्यायलय में एक जज साहब बहुत ही असूल पसंद और ईमानदार आ गए। अब उनके न्यायलय में काफी रसूखदार और पैसे वाले लोगों के मुक़दमे लगे थे। अब एक व्यक्ति जो काफी रसूखदार और पैसे वाला था उसकी पेशी न्यायलय में जब लगती थी तो उसकी फ़ाइल को इस तरह से पेश किया जाता कि उन जज साहब के समय में उसके केस का फैसला न हो सके। मतलब उस फ़ाइल बको किसी तरह से लंबित किया जाता। अब आप अंदाजा लगा लें कि जब वह व्यक्ति अदालत में पेशकार (रीडर) को दिखाता तब वो कर्मचारी फ़ाइल जज साहब के सामने लाते यहाँ भारत के न्यायलयों में रोज हजारों लोग पूरा पूरा दिन न्यायलय के गेट पर अपने केस की पुकार के लिए खड़े रहतें हैं। कि कब उनका नंबर आए। कहा कुछ लोग सेटिंग के दम पर न्याय के मंदिर में ईमानदार जजों से भी काम निकलवा लेते हैं। और उन्हीं जज साहब के रहते उन्हीं के पड़ोस में बैठा उन्हीं के न्यायलय का कर्मचारी वसूली कर रहा है। अब कहने वाले कहेंगे कि दिखावा होगा ईमानदारी का परन्तु नहीं उन्होंने अपने कार्यकाल में कई उदाहरण पेश किए कि ईमानदारी से कैसे न्यायलय को संचालित किया जाता है। अब एक पुलिस कप्तान का उदाहरण जिन्होंने नशे की तरक्की रोकने के लिए बिलकुल फिल्म के स्टाईल में भेष बदल कर तस्करों को रंगे हाथ पकड़ा ये बात अलग है। कि मौके के मुख्यमंत्री के द्वारा दी गई सिपाहियों की भर्ती की लिस्ट फाड़कर मानकों के आधार पर खरें उतरें उम्मीदवारों को ट्रांसफर होने के बावजूद न्यायलय से स्टे (ट्रांसफर) लेकर सही उम्मीदवारों की भर्ती करके गए। इसके एवज में बाकी की लगभग सारी नौकरी ट्रेनिंग कैम्प में की। सरकारें बदलती रहीं। कप्तान साहब तरक्की पाकर विभाग के I.G के ओहदे तक पहुंचे परन्तु बाहर पब्लिक संपर्क का काम नहीं मिला। सारी नौकरी पुलिस ट्रेनिंग कैम्प मधुबन हरियाणा में निकला दी।

                                           ये उदाहरण बतातें हैं कि सिस्टम में अगर टिक कर रहना है तो कमाऊ पूत बनों। लकड़ी नहीं जिससे जो प्रथाएं चल रही हैं वो प्रभावित न हो।

                                           इसलिए भ्रष्टाचार भी जरूरी है। क्यूँ अगर सब कुछ आसानी से मिलता रहेगा तो जो रसूखदार लोग हैं। उनको मान सम्मान कौन देगा। बाकी आप समझदार है। समझ तो गए होंगे।                        

 ज्यादा लम्बा लेख नहीं करेंगे अब आप अंदाजा लगा लें हमारे प्रधानमन्त्री @लाल बहादुर शास्त्री जी बहुत उसूल पसंद बने फिरते घूम रहे थे। क्या मिला मृत्यु कैसे हुई कुछ क्लीयर नहीं है। नेता जी सुभाष चंद्र बोस पता नहीं क्या हुआ अभी तक ये भी क्लीयर नहीं है कैसे मृत्यु हुई। क्या फ़ायदा ईमानदारी का ये सोचता है। वो भारतीय जो अमृत महोत्सव के समय उल्टा झंडा पकडे हर घर तिरंगा और घर घर तिरंगा का नारा लगाते हुए शाम को किसी बीयर बार या शराब के अहाते में किसी महिला कार्यकर्ता के भरे शरीर की कथा ऐसे सुना रहा है जैसे वो कोका पंडित था और कामसूत्र उसी ने लिखा था। कुल मिला कर अब क्या क्या बयान करुं।

                                                       सौ में से अस्सी बेईमान फिर भी

                                                    (मेरा भारत महान)

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